भाग 1 : खामोशी के बीच शरारत
रात का वक्त था।नादवात यूनिवर्सिटी देहरादून का कैम्पस पूरी तरह खामोश डूबा हुआ था। पुरानी इमारतों की छतों पर चाँदनी फैल रही थी, और उनकी परछाइयाँ ज़मीन पर अजीब-सी आकृतियाँ बना रही थीं। हवा में हल्की ठंडक थी और दूर कहीं कोई आवाज़ नहीं थी।रात के ठीक 1:30 बज रहे थे।उसी खामोशी के बीच पाँच लड़के—आरव, समीर, वंश, करण और मंजीत—सिक्योरिटी गार्ड की नजरों से बचते हुए यूनिवर्सिटी के अंदर घूम रहे थे। उनके चेहरों पर उत्साह और शरारत साफ झलक रही थी। यह उनके लिए सिर्फ मस्ती नहीं थी, बल्कि एक तरह का देरिंग एडवेंचर था।वे एक क्लासरूम के अंदर घुसे।क्लासरूम की पीली रोशनी में समीर और वंश ब्लैकबोर्ड पर एक लड़की की पेंटिंग बना रहे थे। चाक की हल्की आवाज़ खामोशी को चीर रही थी।आरव बार-बार दरवाज़े की ओर देख रहा था, बेचैनी उसके चेहरे पर साफ थी।मंजीत खिड़की के पास खड़ा बाहर झांक रहा था, जैसे किसी के आने का इंतज़ार हो।“जल्दी करो,” आरव ने धीमी आवाज़ में कहा,“वरना पकड़े गए तो सीधे हॉस्टल से बाहर।”कुछ ही पलों में पेंटिंग पूरी हो गई।ब्लैकबोर्ड पर लड़की की ड्राइंग जैसे किसी ने सच में ज़िंदगी में उतार दी हो। ब्लैकबोर्ड पर पेंटिंग खत्म हुई। ब्लैकबोर्ड पर उभरी आकृति पहली नज़र में ही ध्यान खींच लेती थी।चेहरा थोड़ा तिरछा, जैसे पोज़ लेते-लेते रुक गई हो। आँखें बड़ी-सी खींची गई थीं, किनारों पर हल्की मोटी रेखाएँ, जिनसे उनमें जानबूझकर ज़्यादा चमक भर दी गई हो। भौंहें एक-दूसरे से हल्की दूरी पर, ऊपर की तरफ उठी हुई—मानो कोई शरारती सवाल पूछ रही हों।होंठ आधी मुस्कान में जमे थे, पूरी तरह खुले नहीं, न पूरी तरह बंद—एक ऐसी स्माइल जो कुछ कहे बिना बहुत कुछ इशारा कर दे। गालों की रेखाएँ ज़रा ज़्यादा उभरी हुई थीं, जिससे पूरा एक्सप्रेशन थोड़ा कार्टून-सा, थोड़ा फ्लर्टी लग रहा था।गर्दन में हल्का-सा मोड़ था और कंधे आराम से ढीले छोड़े गए थे। एक हाथ कमर पर टिका हुआ दिखाया गया था, उँगलियाँ ज़रूरत से ज़्यादा कॉन्फ़िडेंस के साथ फैली हुईं। दूसरा हाथ हवा में, कलाई से थोड़ा मुड़ा हुआ—जैसे बीच में ही कोई पोज़ रोक दिया गया हो।ड्रेस की लाइनें साधारण थीं, लेकिन जानबूझकर कर्व्स के साथ खींची गई—न ज़्यादा डिटेल, न बिल्कुल सीधी। कपड़े और शरीर के बीच की रेखाएँ इतनी थीं कि देखने वाला अपने दिमाग़ में बाकी सब खुद भर ले। पैरों को थोड़ा लंबा दिखाया गया था, घुटनों के पास हल्की-सी टेढ़ी लाइन, जिसने पूरी ड्रॉइंग को मज़ेदार और अनजाने में आकर्षक बना दिया था।अगले ही पल वे वहाँ से निकल पड़े। वही पुराना रास्ता—हॉस्टल की खिड़की से अंदर घुसना, जैसे ये कोई नई बात ही न हो।
भाग 2 मॉर्निंग कैंपस
सुबह की हल्की धूप नादवात यूनिवर्सिटी के कैम्पस में फैलने लगी थी। ठंडी हवा के साथ चिड़ियों की चहचहाहट गूंज रही थी। हॉस्टल के कमरों में धीरे-धीरे जिंदगी लौट रही थी।आरव, समीर, वंश, करण और मंजीत अपने बैग उठाकर बाहर निकले। उनकी आँखों में पिछली रात की शरारत और हल्की-सी थकान साथ-साथ मौजूद थी।“आज थोड़ा संभल कर रहना,” मंजीत ने हँसते हुए कहा,“कहीं कोई हमें देख तो नहीं लिया।”“अरे छोड़ यार,” समीर बोला,“सब ठीक है। वैसे भी, पेंटिंग मज़ेदार बनी थी।”वे बातों में उलझे हुए क्लासरूम की ओर बढ़ चले। कैम्पस अब छात्रों से भरने लगा था, पर पाँचों के दिमाग में अब भी पिछली रात की तस्वीर घूम रही थी।क्लासरूम में पहुंचते ही हलचल साफ दिखने लगी।ब्लैकबोर्ड पर बनी पेंटिंग सबकी नजरों में थी।कुछ छात्र उसे देखकर हँस रहे थे, कोई कान में फुसफुसा रहा था। धीरे-धीरे पूरी क्लास में मस्ती का माहौल बनने लगा।तभी अध्यापक अंदर आए।उनकी नजर जैसे ही ब्लैकबोर्ड पर पड़ी, उनके चेहरे का भाव बदल गया।“ये किसने किया है?”उनकी आवाज़ में सख्ती थी।पूरी क्लास अचानक चुप हो गई।कोई बोल नहीं रहा था।“किसी ने देखा?”फिर वही सन्नाटा।अध्यापक कुछ पल पूरे क्लास को देखते रहे। फिर धीरे-धीरे ब्लैकबोर्ड मिटाते हुए बोले—“यही सब करोगे, तो पढ़ाई में कभी आगे नहीं बढ़ोगे।तुम लोगों ने पूरे स्कूल का माहौल बिगाड़ कर रख दिया है। समझे?”क्लास में हँसी का नामोनिशान नहीं रहा।फिर उन्होंने एक तरफ बैठे नए चेहरे की ओर इशारा किया।“ये है सार्थक। आज से हमारी क्लास में है।इसे परेशान मत करना।”सार्थक ने हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर झुका दिया।वह शांत था। बहुत शांत।आरव, समीर, वंश, करण और मंजीत उसे ध्यान से देखने लगे।नया लड़का। नया चेहरा। कुछ अलग-सा।समीर ने हाथ उठाया।“सर, ये सीधे सेकंड ईयर में कैसे आ गया?”अध्यापक बोले,“सार्थक पहले दिल्ली में पढ़ता था। उसके पिता की पोस्टिंग देहरादून हो गई थी।वहाँ पहला साल पूरा हो चुका है, इसलिए यहाँ सीधे सेकंड ईयर में एडमिशन हुआ है।”समीर चुप हो गया।क्लास की घंटी बजी।“फिज़िक्स का असाइनमेंट करो,”अध्यापक बोले और क्लास से बाहर चले गए।जैसे ही अध्यापक बाहर गए, करण और मंजीत उठे और सार्थक की मेज़ के पास चले गए।वे आराम से उसकी मेज़ पर बैठ गए, पैर फैला कर—एक-एक तरफ।सार्थक शांत बैठा रहा।दूर से आरव, समीर और वंश यह सब देखकर मुस्कुरा रहे थे।यह उनकी रोज़ की मस्ती थी—खुद को सीनियर दिखाने का अंदाज़।“तू रहता कहाँ है?”करण ने पूछा।“हॉस्टल,”सार्थक ने शांति से जवाब दिया।“और तेरे पापा?”“टीचर हैं।”सार्थक के जवाब छोटे थे, पर उसकी आवाज़ में अजीब ठहराव था।तभी क्लास में इतिहास की अध्यापिका दाखिल हुईं।“वंदना मैडम!”आरव की आवाज़ गूंजी।यह सुनते ही करण और मंजीत फुर्ती से उठे और अपनी सीटों पर जा बैठे।इतनी तेजी से, जैसे कुछ हुआ ही न हो।आरव, समीर, वंश, में दबा-सा हास्य फैल गया।सार्थक हल्का-सा मुस्कुराया।यह सब उसके लिए शायद नया नहीं था।कुछ देर बाद अध्यापिका ने पढ़ाना शुरू कर दिया। कक्षा में फिर से वही पढ़ाई वाली ख़ामोशी लौट आई—किताबों के पन्नों की सरसराहट, पेन की हल्की आवाज़ और बोर्ड पर लिखे जा रहे शब्द।उसी दौरान वंश ने चुपके से अपनी कॉपी का एक पन्ना फाड़ा। उसने जल्दी-जल्दी उस पर कुछ लिखा, फिर उसे अपनी हथेली में दबाकर एक छोटी-सी गेंद बना ली। उसके चेहरे पर हल्की-सी शरारती मुस्कान थी।क्लास के आगे की पंक्ति में बैठी पायल—जिसे वंश पसंद करता था, और जो वंश को भी पसंद करती थी—उसे इसकी भनक तक नहीं लगी। दोनों के बीच ये छोटी-छोटी हरकतें आम थीं।अचानक वंश ने वह काग़ज़ की गेंद पायल की ओर उछाल दी।अचानक कुछ उसके ऊपर लगा।“आह!”पायल हल्की-सी चीख पड़ी—क्योंकि यह सब एकदम अचानक हुआ था।वह चौकन्नी होकर इधर-उधर देखने लगी। काग़ज़ की गेंद उसकी बेंच से लुढ़कती हुई नीचे ज़मीन पर गिर गई।पिछली बेंच पर बैठा सार्थक यह सब चुपचाप देख रहा था। उसकी नज़र पायल के चेहरे पर गई—फिर उस लुढ़कते काग़ज़ पर।इसी दौरान अध्यापिका की नज़र भी उस गिरे हुए काग़ज़ पर पड़ गई।उन्होंने पढ़ाना रोक दिया।धीमे क़दमों से वह आगे बढ़ीं, ज़मीन से वह काग़ज़ उठाया और उसे खोल लिया।कक्षा में सन्नाटा छा गया।काग़ज़ पर बस एक ही शब्द लिखा था—“कैंटीन…”कैंटीन के कोने वाली मेज़ पर वंश, पायल, समीर, करण, मंजीत और आरव बैठे थे। स्टील की प्लेटों में चाय और समोसे रखे थे, और उनकी हँसी कैंटीन के शोर में घुलती जा रही थी।वे सब उसी मस्ती को दोबारा जी रहे थे, जो थोड़ी देर पहले क्लासरूम में की थी। अगला पीरियड छोड़ देने का हल्का-सा अपराधबोध था, लेकिन हँसी उसे दबाए जा रही थी।पायल ने चाय का घूंट लिया और हल्की-सी आँखें तरेरते हुए बोली,“तुम लोग कभी नहीं सुधरोगे। ब्लैकबोर्ड वाली पिक्चर… तुमने ही बनाई थी ना?”उसके स्वर में नाराज़गी कम और यक़ीन ज़्यादा था। जैसे उसे पता हो कि इनके अलावा ऐसा कर ही कौन सकता है। साथ ही उसकी आँखों में सच्ची उत्सुकता भी थी—वह सच जानना चाहती थी।पाँचों लड़के एक पल के लिए चुप हो गए।उन्होंने एक-दूसरे की तरफ देखा—जैसे दिमाग़ में एक ही सवाल चल रहा हो: इसे पता कैसे चला?फिर सबकी नज़र एक साथ वंश पर गई।वंश ने बिना कुछ कहे, बस हल्का-सा आँखों से इशारा किया—नहीं… मैंने कुछ नहीं बताया।अगले ही पल, सब ज़ोर से हँस पड़े।कैंटीन की हवा में खिलखिलाहट गूँज गई।वंश हँसते हुए बोला,“इतना ज़ोरदार रिएक्शन देने की क्या ज़रूरत थी? हम पकड़े जाते तो?”उसके लहजे में प्यार भी था और पकड़े जाने का डर भी।आरव ने सिर हिलाया,“आज तो सच में बहुत बड़ा कांड हो जाता।”मंजीत ने आराम से कुर्सी से टेक लगाई और मुस्कराकर बोला,“अरे, हम दोस्त हैं। सब संभाल लेंगे…पर मस्ती रुकनी नहीं चाहिए।”सब फिर हँस पड़े।कॉलेज की क्लास खत्म हो चुकी थी।घंटी बजते ही पूरा परिसर अचानक शोर और उत्साह से भर गया। छात्र-छात्राएँ हँसते-बोलते, बैग संभालते हुए कक्षा से बाहर निकलने लगे।लेकिन वंश की पूरी गैंग अब भी क्लासरूम में ही थी।आरव, समीर, करण, मंजीत—सब वहीं थे, और पायल भी उनके साथ खड़ी थी।सार्थक यह सब दूर से देख रहा था।उनकी बेपरवाह हँसी, बिना किसी डर के मस्ती—उसे सब कुछ अलग-सा लग रहा था।उसके मन में एक ख्याल उभरा—इनसे दोस्ती करनी चाहिए। ये लोग खुलकर जीते हैं। न किसी से डरते हैं, न ज़्यादा सोचते हैं। शायद यही मेरी सही कम्पनी होगी।इन्हीं सोचों के बीच वह चुपचाप अपनी किताबें बैग में रखने लगा।उधर वंश पायल की ओर मुड़ा और बोला,“अरे सुन, मेरा एसाइनमेंट आज पूरा कर देना।”पायल ने उसे देखते ही आँखें घुमाईं।“हर बार यही होता है। खुद भी तो कभी कर लिया करो।”करण बीच में हँसते हुए घुसा,“तुम कर दो ना… फिर हम सब भी उसी में से कॉपी कर लेंगे।”वंश ने मासूमियत और मस्ती भरे अंदाज़ में पायल की तरफ देखा,“तुम जानती हो ना… मैं कितना बिजी रहता हूँ। टाइम ही नहीं मिलता।”पायल हँस पड़ी।“हां-हां, पता है तुम्हारा ‘काम’। चलो, अब मैं चलती हूँ।”वह मुड़ी और जाते हुए बोली,“रात में कॉल करती हूँ।”पायल ने सबको हल्के-से हाथ हिलाकर बाय" कहा और क्लासरूम से बाहर निकल गई।कुछ ही देर में आरव, समीर, करण और मंजीत भी उठे।हँसी-मज़ाक करते हुए वे अपने बैग कंधे पर टाँगकर हॉस्टल की ओर चल पड़े। क्लासरूम धीरे-धीरे खाली हो गया।सिर्फ़ सार्थक एक पल के लिए रुक गया।उसकी नज़र जाती हुई उस टोली पर थी—और उसके मन में वही एक ख्याल गूंज रहा था—शाम ढलने लगी थी।नादवात यूनिवर्सिटी का कैंपस अब सुबह की भीड़ से खाली हो चुका था। आसमान में हल्का नारंगी रंग फैल चुका था और ठंडी हवा में दिन की थकान घुलने लगी थी।हॉस्टल के बाहर चहल-पहल बढ़ रही थी।कुछ छात्र सीढ़ियों पर बैठे बातें कर रहे थे, कुछ मोबाइल में लगे थे, और कुछ कैंटीन से लौटते हुए हँसी-मज़ाक कर रहे थे।आरव, समीर, वंश, करण और मंजीत हॉस्टल के गेट से अंदर दाख़िल हुए।दिन भर की मस्ती के बावजूद, अब सबके कदम धीमे थे।“आज कुछ अलग करते हैं,” समीर ने बैग नीचे रखते हुए कहा।“हर रोज़ की तरह बस यूं ही पड़े रहें?”करण ने चप्पल उतारते हुए हँसकर जवाब दिया,“अलग तो रोज़ करते हैं… इसी लिए तो सब जानते हैं हमें।”मंजीत ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए कहा,“पर आज मूड थोड़ा अलग है… क्लास में जो नया लड़का आया है ना—सार्थक।”वंश ने बिना ज़्यादा ध्यान दिए कहा,“शांत टाइप लग रहा है।”उसी वक्त, हॉस्टल की दूसरी तरफ़ से सार्थक भी अपना बैग लिए अंदर आ रहा था।यह उसकी पहली शाम थी इस हॉस्टल में।कमरा छोटा था, लेकिन साफ़।एक पल के लिए वह दरवाज़े पर खड़ा रहा।नई जगह, नए लोग… और एक अजीब-सी खामोशी।उसने बैग बिस्तर पर रखा और गहरी साँस ली।बाहर से लड़कों की हँसी की आवाज़ आई।वही हँसी—जो उसने दिन में क्लास में देखी थी।सार्थक खिड़की की ओर बढ़ा।नीचे देखा—वही पाँच लड़के।वह कुछ देर तक उन्हें देखता रहा।मन में फिर वही ख़याल आया—इनसे दोस्ती करनी चाहिए… अकेले रहने से अच्छा है।उधर नीचे, वंश ने ऊपर देखा।एक पल के लिए उसकी नज़र सार्थक से मिली।क्षण भर की चुप्पी।फिर वंश ने हाथ हिलाया,“ओए नए! नीचे आ, चाय पी रहे हैं।”सार्थक हल्का-सा मुस्कुराया।पहली बार इस नए शहर में उसे कुछ जाना-पहचाना सा लगा।उसने अपना दरवाज़ा बंद किया…और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ चला।
भाग 3 होस्टल मेंस
मेस के बाहर पीली रोशनी हल्की-हल्की झिलमिला रही थी। स्टील के थालियों और प्लेटों की खनक, गरम खाना और हल्की हलचल से माहौल थोड़ा सुकून भरा लग रहा था।आरव, समीर, वंश, करण और मंजीत एक कोने की मेज़ पर बैठे थे। बीच में प्लेटों में दाल, चावल, रोटी और सब्ज़ी रखी हुई थी।मेस के बाहर पीली रोशनी जल रही थी।थोड़ी देर बाद सार्थक भी हिचकिचाते हुए पास आया।“बैठ जा,” वंश ने ठुड्डी से इशारा किया,“यहाँ formalities नहीं चलतीं।”सार्थक कुर्सी खींचकर बैठ गया।पहली बार उसे लगा कि शायद जगह इतनी अजनबी नहीं है।“तो नए,” करण ने चाय उठाते हुए कहा,“पहला दिन कैसा लगा?”सार्थक हल्का मुस्कुराया।“ठीक… मतलब अलग है। इतनी बड़ी यूनिवर्सिटी मैंने पहले नहीं देखी।”मंजीत ने हँसते हुए कहा,“अभी तो कुछ देखा ही नहीं है। रात में समझ आएगा।”आरव ने उसकी बात काटते हुए कहा,“और हॉस्टल के कुछ रूल्स भी हैं।”“जैसे?” सार्थक ने पूछा।समीर ने झुककर धीमी आवाज़ में कहा,“जैसे… रात में जो आवाज़ें आएँ, उन्हें ignore करना।”सार्थक चौंक गया।“कौन-सी आवाज़ें?”पाँचों एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।फिर अचानक सब ज़ोर से हँस पड़े।“डरा दिया क्या?” वंश ने हँसते हुए कहा।“मज़ाक कर रहे हैं भाई।”सार्थक भी हल्का हँस दिया, लेकिन उसकी आँखों में हल्की जिज्ञासा रह गई। वैसे,” उसने बात बदलते हुए पूछा,“तुम लोग हमेशा साथ रहते हो?”“हाँ,” आरव ने कहा,“काफी टाइम से। इसी हॉस्टल ने जोड़ दिया।”सार्थक उनके सामने बैठा था, लेकिन अब भी उनके घेरे का हिस्सा नहीं लगा।वह मौजूद था, पर शामिल नहीं।वह खुद ही बात आगे बढ़ाने की कोशिश करने लगा।“वैसे… तुम्हारा और सबका हॉस्टल कौन-सा है?” उसने सहजता से पूछा।करण ने बिना ज़्यादा भाव दिए जवाब दिया,“यही वाला।”वंश ने अचानक उसकी तरफ देखा।“तुम्हें कौन-सा कमरा मिला है?”“401,” सार्थक ने कहा।यह सुनकर पाँचों ने एक-दूसरे की तरफ हल्की नज़र डाली।ना मुस्कान, ना कोई प्रतिक्रिया—बस एक छोटा-सा मौन।सार्थक खाना खाते हुए वह थोड़ी हिम्मत जुटा सका।“अगर फ्री हो,” उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा,“तो कभी यूनिवर्सिटी घुमा देना। नई जगह है, सब नया-नया लग रहा है।”मंजीत ने चम्मच नीचे रखी और बिना ज़्यादा उत्साह के बोला,“अभी तो बहुत टाइम है घूमने का।”उसका लहजा ठंडा नहीं था—बस साफ़ था वंश और उसका ग्रुप खाने के बाद अपने कमरे की तरफ जल्दी-जल्दी बढ़ गया। उनका कमरा मेस के पास था, इसलिए गलियारे में कदम हल्के-हल्के पड़ते हुए भी तेज़ी से कमरे तक पहुंचे।उसी गलियारे में सार्थक भी धीरे-धीरे अपने कमरे की तरफ बढ़ रहा था। वह चौथी मंजिल की ओर जा रहा था, लेकिन उसका कदम असमंजस और उत्सुकता से भरा हुआ था।सार्थक ने थोड़ी देर रुककर देखा कि वंश ग्रुप के लड़के कमरे में प्रवेश कर चुके हैं। उसके मन में यह विचार आया—“कैसे मैं इनके साथ शामिल हो सकता हूँ, ताकि मैं भी उनके ग्रुप की मस्ती में हिस्सा बन सकूँ?”करण ने धीरे से अपने कमरे का गेट बंद कर दिया। गेट की खनक के साथ गलियारे में एक हल्की खामोशी छा गई।गलियारा धीरे-धीरे शांत हो गया, लेकिन उस खामोशी में दोनों के बीच एक अनकही कहानी की शुरुआत महसूस हो रही थी—एक तरफ नया दोस्त बनना चाहता लड़का, और दूसरी तरफ उसका ध्यान सिर्फ अपनी दुनिया में व्यस्त लड़के पर था।कमरे में वैंश ग्रुप धीरे-धीरे अपने-अपने कामों में लग गए।वैंश ने मोबाइल उठाया और बाहर बालकनी की तरफ निकल गया। उसने हँसते हुए फोन कॉल पर कहा,“हैलो प्यारी, कैसे हो?”फोन की दूसरी तरफ से पायल की आवाज़ आई, और दोनों की हँसी गलियारे में हल्की-हल्की गूँज रही थी।कक्ष में करण और मंजीत अपने मोबाइल पर वीडियो गेम में मशगूल हो गए। कभी-कभार करण ने मंजीत की तरफ देखा और हँसी रोकते हुए कहा,“ये ले… देख मेरा स्कोर!”मंजीत ने पलटकर कहा, “अरे भाई, अभी तो असली गेम शुरू हुआ है।”वहीं कमरे के दूसरे कोने में समीर और आरव बाहर जाने की तैयारी कर रहे थे। आरव ने हल्का हँसते हुए कहा,“चलो, थोड़ी ताजी हवा और सिगरेट का मज़ा लेते हैं।”समीर ने मुट्ठी में सिगरेट रखी और बोला,“हाँ, ये थोड़ा आराम दे देगा।”कमरा धीरे-धीरे अपने-अपने मोड में शांत हो गया, लेकिन गलियारे की हल्की रोशनी और फोन की हँसी की आवाज़ अभी भी वहां मौजूद थी।सार्थक अपने कमरे में धीरे-धीरे दाखिल हुआ। कमरे की हल्की रोशनी और खिड़की से आती ठंडी हवा उसे थोड़ा सुकून दे रही थी। उसने बैग को टेबल पर रखा और किताबें क्रम से शेल्फ़ में सजाने लगा।कुछ देर तक वह चुपचाप अपने काम में लगा रहा। फिर उसने अपनी डायरी निकालकर सामने रखी। कलम हाथ में लेते ही उसने हल्की साँस भरी और लिखा शुरू किया:"आज का दिन… बहुत अलग रहा। यूनिवर्सिटी में नया माहौल, नए लोग… और हाँ, वंश और उसका ग्रुप। वो सब अपनी मस्ती में इतने सहज हैं कि मुझे भी उनके बीच जाने की इच्छा हुई। लेकिन अब भी थोड़ा डर है—ये सब मेरे लिए नया है।"सार्थक ने कलम कुछ देर के लिए रोक दी। आँखें थोड़ी दूर गलियारे की तरफ गिरीं। उसने खुद से कहा,"मैं भी इस ग्रुप का हिस्सा बन सकता हूँ… बस थोड़ा समय और धैर्य चाहिए।"फिर उसने धीरे-धीरे डायरी में आगे लिखा:"आज मैंने पहली बार उनके मस्ती और हँसी का हिस्सा होते हुए देखा। लगता है, अगर मैं सही समय पर उनके साथ जुड़ जाऊँ, तो शायद दोस्ती भी होगी। और शायद… इस नए अनुभव से मैं खुद को बेहतर समझ पाऊँ।"भाग 4 मॉर्निंग कैंपसकई पन्नों तक उसने बस अपने ख्याल और महसूस किए गए हर पल को लिखा। जैसे ही कलम खत्म हुई, सार्थक ने डायरी को ध्यान से बंद किया और उसे शेल्फ़ में रखा। उसकी आँखों में हल्की चमक थी—उत्सुकता, उम्मीद और नए अनुभव की शुरुआत का मेल।कमरा शांत हो गया। सार्थक अपने बैग के पास खड़ा कुछ पल के लिए खामोश रहा, फिर धीरे-धीरे बिस्तर की ओर बढ़ा। आज का दिन उसके लिए सिर्फ़ एक शुरुआत था—एक नई दुनिया, नए दोस्त और नए अनुभवों की।सुबहे का हल्का उजाला नादवात यूनिवर्सिटी के हॉस्टल के गलियारे में फैला हुआ था। हर ओर हल्की हलचल थी—छात्र जल्दी-जल्दी तैयार हो रहे थे, बैग अपनी जगहों पर रख रहे थे, और कुछ लोग अभी तक नींद से जूझ रहे थे।आरव और समीर अपने कमरे के बाहर खड़े थे। वे अपने दोस्तों का इंतजार कर रहे थे, हाथ में बैग और चेहरे पर हल्की सी मुस्कान।“चलो यार, क्लास के लिए लेट हो रहे हैं,” समीर ने अधीरता से कहा।तभी कमरे की ओर से करन का सिर बाहर निकला। “रुको, आ रहा हूँ… पहले शॉक्स पहन लूँ। वंश अभी तैयार नहीं हुआ है,” उसने मुस्कुराते हुए कहा।आरव ने पीछे से वंश को हँसते हुए आवाज़ दी, “चल भाई, तैयार हो जा, अब तो चलना ही पड़ेगा!”वंश ने हल्का सा सिर हिलाते हुए जवाब दिया, “हाँ भाई, हाँ… तुम लोग चलो, मुझे बस दस मिनट लगेंगे।”करन जल्दी से शॉक्स पहनकर तैयार हो गया।अब आरव, समीर, करन और मंजीत हल्की मस्ती-मज़ाक करते हुए क्लासरूम की ओर चल पड़े। उनके कदमों में हँसी और दोस्ती की गर्माहट झलक रही थी। गलियारा उनकी हल्की बातचीत और हँसी से गूंज रहा था।वंश थोड़ी देर बाद उनके पीछे आया, बैग की पट्टियों को ठीक करते हुए। उसकी आँखों में हल्की उत्सुकता थी, जैसे कि आज का दिन कुछ अलग ही रोमांच लेकर आने वाला हो।सारे दोस्त मिलकर धीरे-धीरे क्लासरूम की ओर बढ़ रहे थे, हर कदम उनके बीच की दोस्ती और मस्ती को और गहरा बना रहा था।वँश पूरे होश में था, लेकिन देर हो चुकी थी। वह हॉस्टल के दरवाजे से बाहर निकलते ही तेजी से दौड़ पड़ा, बैग पीछे लटक रहा था और बाल थोड़े उखड़ रहे थे। हर कदम पर उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था—“आश्चर्य है कि आज शशिपाल सर किस मूड में होंगे।”वह गलियारे से निकलकर सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ क्लासरूम की ओर बढ़ा। जैसे ही उसने दरवाजे की ओर देखा, फिजिक्स के क्लासरूम में सन्नाटा था। शशिपाल सर बोर्ड के पास खड़े थे और छात्रों की नजरें बस वहीं टिक गई थीं।वँश ने दरवाजे पर रुककर धीरे से कहा," में ई कम इन,सर?"शशिपाल सर ने ऊपर से नीचे तक उसे निहारते हुए, हल्की तंज में कहा,“आओ आओ, आपका इंतजार तो मुझे ही था… मालिक, आप आ गए! आने में कोई दिक्कत तो नहीं हुई?”क्लास में बैठे छात्रों की आंखें चमक गईं। कुछ ने हौले से हँसी दबाई, तो कुछ अपनी कुर्सियों पर झुक कर हँसी रोक रहे थे।वँश ने शर्म से सिर झुकाते हुए कहा,“नहीं सर, कोई प्रॉब्लम नहीं हुई।”शशिपाल सर ने गंभीर मुद्रा में आगे बढ़ते हुए पूछा,“तो फिर लेट क्यों आए? तुम्हें क्लास का समय नहीं पता?”वँश ने थोड़ा घबराते हुए उत्तर दिया,“सर… मैं टाइम पर ही हॉस्टल से निकला था… रास्ते में सीनियर मिल गए, हल्का सा हेलो करने में टाइम लग गया।”यह सुनते ही क्लास में जोर-जोर से हँसी गूंज उठी। कुछ छात्र अपने नोटबुक से चेहरे छिपा रहे थे, तो कुछ कुर्सी पर झूलते हुए हँसी रोक रहे थे।जैसे ही फिजिक्स का पीरियड खत्म हुआ, आरव ने आँख मारते हुए कहा,“चलो भाई, आज कैंटीन में ही आराम करते हैं।”समीर ने हँसते हुए जोड़ा,“हाँ, वँश की ‘टाइम मैनेजमेंट’ की कहानी सुनकर पेट में दर्द हो रहा है!”वँश ने थोड़ा झेंपते हुए कहा,“अरे यार… छोड़ो भाई, मैं तो बस लेट हुआ।”लेकिन मस्ती करने का मौका कोई नहीं छोड़ना चाहता था। करण और मंजीत आलरेडी तैयार थे।“तो चलो कैंटीन, चाय और समोसे खाकर वँश की शर्म उतार देते हैं,” मंजीत ने हँसते हुए कहा।कैंटीन पहुँचते ही वे पांचों एक कोने की मेज़ पर बैठ गए।स्टीम उठती चाय की खुशबू, गरम समोसे और हल्की हलचल माहौल में मस्ती भर रही थी।आरव ने हँसते हुए कहा,“वाह वँश! ये लेट आने का एक्सक्यूज़ सच में कमाल का था!”समीर ने भी तंज भरे अंदाज़ में जोड़ा,“हाँ, सीनियर से ‘हेलो’ करने में 10 मिनट, और सर के सामने शर्मिंदगी में पूरा पीरियड!”वँश थोड़ी झेंपते हुए मुस्कराया।“अच्छा, अब चुप रहो, खाना तो शुरू करो।”मंजीत ने समोसा उठाते हुए कहा,“चलो भाई, आज तो वँश की टांग खींचने का दिन है।”करण ने भी हँसते हुए जोड़ा,“हाँ, भाई, तुम्हारी ‘टाइम मैनेजमेंट’ के किस्से हमेशा याद रहेंगे।”सार्थक ने धीरे-धीरे कैंटीन की ओर कदम बढ़ाए। क्लास से भागकर आते हुए उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। सामने वही चारों—वंश, आरव, करण और मंजीत—कैंटीन के एक कोने की मेज़ पर बैठे थे, हँसी-मज़ाक और टीजिंग में डूबे हुए।“आज… आज मैं भी उनके बीच घुल जाऊँगा,” उसने अपने आप से कहा।जैसे ही वह उनके पास पहुँचा, थोड़ी झिझक के साथ कुर्सी खींची। मंजीत ने तुरंत उसकी ओर देखा और मुस्कुराते हुए कहा,“ओए! इधर आ, कहाँ घूम रहा है?!”सार्थक ने हल्की मुस्कान दी। चारों की निगाहें अब उस पर टिक गई थीं। वंश ने उसकी तरफ देखा और सिर हिलाया, लेकिन करण की आंखों में थोड़ी गंभीरता अभी भी साफ़ थी।तो… यहाँ क्यों? क्लास में क्यों नहीं हो?” करण ने गंभीर लहजे में पूछा।“बस… भूख लगी थी, इसलिए आ गया,” सार्थक ने उत्तर दिया, पर उसकी आंखों में हल्की नर्वसनेस झलक रही थी।“हाह! ये भी निकला छुपा रुस्तम,” मंजीत हँसा। “शकल से तो पढ़ने वाला लगता है और क्लास बंक कर रहा है।”वंश और करण कुछ नहीं बोले। सार्थक थोड़ी देर खामोश रहा, फिर धीरे से बोला,“मैं कुछ लेकर आता हूँ… किसी को चाय चाहिए?”करण ने सिर हिलाकर इशारा किया, “नहीं… बस तुम जाओ।”सार्थक ने कुर्सी से उठकर समोसे लेने की ओर बढ़ा।“ये लड़का… अजीब लगता है।,” करण ने अचानक कहा।सभी की नजरें उसकी ओर टिक गईं।“नहीं भाई, अच्छा लगता है,” मंजीत ने मुस्कुराते हुए कहा।आरव ने मज़ाक में पूछा,“तुझे कैसे पता?”“बस… लगता है,” मंजीत कुर्सी मै कमर टेकते हुए बोला।सार्थक समोसा लेकर वापस आया। वंश ने उसे इशारे से शांत रहने का सिग्नल दिया। सार्थक चुप रहा, थोड़ी असहजता महसूस कर रहा था—क्या ये लोग उसे एक्सेप्ट करेंगे या नहीं?तभी मंजीत ने हल्की उत्सुकता में पूछा,“तुमने एसाइनमेंट किया?”हाँ, कर लिया,” सार्थक ने जवाब दिया।“अच्छा है! हमें भी दिखाओ,” आरव ने कहा।“होस्टल में है, वहाँ दे दूँगा,” सार्थक ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।एसाइनमेंट का नाम सुनते ही वंश ने चौंकते हुए कहा,“ओह… पायल ने किया होगा। मैं लेकर आता हूँ।”सार्थक ने थोड़ी हिचकिचाहट में कहा,“मंजीत, अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हारा एसाइनमेंट भी कर दूँ।”“हम खुद कर लेंगे, तुम क्यों?” करण ने पूछा।“मेरा रिवीजन भी हो जाएगा और तुम्हारा काम भी,” सार्थक ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।मंजीत खुश हो गया। सार्थक ने पहली बार महसूस किया कि छोटे-छोटे गेस्चर भी दोस्ती की शुरुआत हो सकते हैं।फिर उसने हिचकिचाते हुए कहा,“एक्चुअली… आज मेरा बर्थडे है। और तुम सब इनवाइट हो मेरी तरफ़ से।”सभी लोग खुशी से उठ खड़े हुए, “हैपी बर्थडे, सार्थक!”मंजीत ने शरारती अंदाज़ में कहा,“अब तो समोसे का बिल यहीं भरेगा।”सार्थक ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,“ठीक है… कोई फॉर्मेलिटीज नहीं, बस मस्ती।”कैंटीन में लाफ्टर की हल्की-हल्की गूँज फैल गई। सार्थक ने महसूस किया—यह वही जगह है, जहाँ वह अपनी अवकार्डनेस को भूलकर खुद को एक्सेप्ट कर सकता है।होस्टल का कमरा धुंधली रोशनी में डूबा हुआ था। वंश, करण, आरव, मंजीत और समीर एक ही कमरे में बैठे थे। सिगरेट की हल्की-सी धुंध हवा में तैर रही थी, और कमरे में आराम से साइलेंस और कैजुअल टीजिंग का मिश्रण था।मंजीत ने सिगरेट पास करते हुए धीरे से कहा,“वंश… तुम्हें पता है ना… आज वो नया लड़का, सार्थक, उसने हमें इनवाइट किया है। बर्थडे है उसका।”वंश ने सिगरेट की स्टब नीचे रखते हुए पहले करण की ओर देखा, फिर आरव की तरफ।“क्या सच में?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा, पर उसके दिमाग में आलरेडी प्लान चल रहा था—“बर्थडे है… और ये परफेक्ट मौका है थोड़ी मस्ती करने का।”आरव ने हल्की हँसी के साथ सिर हिलाया,“हाँ भाई… सच में। बर्थडे है आज।”वंश ने मुस्कान के साथ उठते हुए कहा,“तो ठीक है… चलो, देखते हैं ये पार्टी बॉय कहाँ है। आज इसे थोड़ी मस्ती करानी पड़ेगी।”उसके दिमाग में आलरेडी स्ट्रेटजी चल रही थी—कौन प्रैंक करेगा, कौन टीजिंग में ऐक्टिव रहेगा, और नया लड़का कैसे रिएक्ट करेगा।मंजीत ने सिगरेट की धुंध में हल्का सा हँसते हुए पूछा,“भाई… क्या पार्टी करेंगे? होस्टल में तो कुछ स्पेशल नहीं मिलेगा।”सभी कुछ पल के लिए सोच में पड़ गए। कमरे में सिगरेट की धुंध धीरे-धीरे हवा में तैर रही थी।वंश ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा,“चलो, कुछ सोचा जाए। आज होस्टल में भी थोड़ी अलग पार्टी कर लेते हैं।”उसने फिर करण की तरफ देखा, मुस्कान के साथ टीजिंग टोन में बोला,“आज… बीयर पार्टी होगी।”मंजीत ने आइब्रो ऊपर उठाते हुए पूछा,“अरे… वो लड़का तो ड्रिंक करता है या कैसे पता चलेगा?”करण ने सिगरेट की राख झटकते हुए कहा,“वंश, ये लड़का अगर हम जैसे हैं तभी हमारे ग्रुप में टिकेगा। वरना… छोड़ दो।”उसके दिमाग में अल स्चट्रेटजी चल रही थी—“देखना है कि नया लड़का कितना बोल्ड है, टीजिंग सह पाएगा या नहीं।”मंजीत ने हल्की राहत की साँस ली, फिर मुस्कुराया,“अच्छा… कम से कम मुझे मेरी एसाइनमेंट करवाने वाला तो मिल ही गया।”वंश ने आरव की ओर देखा और सिर हिलाया,“ठीक है… तुम जा कर Sarthak को बुला लाओ। पूछो कि पार्टी के लिए रेडी है या नहीं।”आरव ने बैग उठाया और दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए कहा,“हाँ, मैं चला आता हूँ।”समीर सिगरेट पास करते हुए हल्की हँसी के साथ बोला,“चलो भाई… अब बस इंतजार है।”चारों हल्की मुस्कान के साथ एक-दूसरे की तरफ़ देखे। कमरे में स्मोक और टीजिंग की सबतल एनर्जी थी। हर कोई सोच रहा था—आज की रात होस्टल की यादों में हमेशा के लिए दर्ज होने वाली है।वंश ने खुद से सोचा,“चलो देखते हैं, नया लड़का कितना बोल्ड है… और हमारी मस्ती को handle कर पाएगा या नहीं।”मंजीत ने सिगरेट पास करते हुए कहा,“अब बस इंतजार है। कुछ अलग होने वाला है।”कमरा हल्की हँसी, स्मोक और मिस्चिवास एनर्जी में डूबा हुआ था। चारों स्लोली उठकर प्लास कन्फर्म करने लगे—कौन बीयर लेकर आएगा, होस्टल का गलियारा हल्की रोशनी में चमक रहा था। वंश, करण, आरव, मंजीत और समीर कमरे में बैठे थे, सिगरेट की धुंध धीरे-धीरे हवा में तैर रही थी।
भाग 4 नाइट आउट पार्टी
कमरे की एनर्जी हल्की-सी बिज़्जिंग था दरवाजा धीरे-धीरे खुला और आरव ने पीछे मुड़कर देखा,“अरे भाई… सार्थक आ गया।”सार्थक कुछ हिचकिचाते हुए कमरे में कदम रखा। उसने चारों की तरफ़ देखा—थोड़ा नर्वस, थोड़ा क्यूरियस।वंश ने सिगरेट की स्टब नीचे रखते हुए मुस्कुराया,“ओये नए… अंदर आओ। बर्थडे बाय वेल्कम है।”सार्थक ने हल्की मुस्कान दी और धीरे से कमरे के बीच में आकर चेयर खींची।“हाय…” उसने कहा, उसकी आवाज़ में थोड़ी हैसिटेशन थी।समीर ने सिगरेट पास करते हुए टीजिंग टोन में कहा,“तो भाई… बीयर पीते हो या सिर्फ चकना खाओगे।समीर के सवाल के बाद कमरे में एक पल के लिए खामोशी छा गई।सिगरेट की धुंध हवा में अटकी रह गई, जैसे सबकी निगाहें एक साथ सार्थक पर टिक गई हों।सार्थक ने हल्का-सा गला साफ किया।उसके दिमाग में एक साथ कई आवाज़ें चल रही थीं—“अगर मना किया, तो यही लिमिट रह जाएगी…”“अगर हा बोला, तो शायद अंदर की एंट्री मिल जाए…”उसने वंश की तरफ देखा। वंश कुछ नहीं बोल रहा था—बस आराम से कुर्सी में बैठा था था, सिगरेट उँगलियों के बीच, आँखें सीधी उसी पर।सार्थक ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया।“बीयर… हा, पी लेता हूँ।”बस इतना कहना था।मंजीत ने तुरंत टेबल पर हाथ मारा।“बस ! बता रहा था में—ये बिल्कुल अपने जैसा ही निकलेगा” आरव हँसते हुए बोला बर्थ डे बॉय नर्वस निकला, पर चॉइस सही है।
“करन अब तक चुप था। उसने साइड में रखी बोतल उठाई, कैप खोली—टक—और बिना कुछ कहे सार्थक की तरफ बढ़ा दी।कोई लेक्चर नहीं, कोई जजमेंट नहीं। समीर ने सिगरेट बुझाकर खिड़की खोली।“स्लो रहना भाई आज ट्रायल नहीं, चिल नाइट है। "सार्थक ने बोतल पकड़ी ।हाथ में हल्की टाइटनेस थी, पर उसने हाइड कर ली। और बीयर पीने लगा। बीयर की बोतलें अब आधी खाली थीं।कमरे की रोशनी वही थी, पर माहौल बदल चुका था।हँसी ज़रा ज़्यादा खुली हुई थी, आवाज़ें ज़रा तेज़—और दिमाग़ उतने ही हल्के।
मंजीत ने कुर्सी से थोड़ा आगे झुकते हुए कहा,“
वैसे… हम लोग रात को कॉलेज में मस्ती करते है।, पता है?”उसकी ज़बान हल्की लड़खड़ा रही थी, पर चेहरे पर गर्व था।उसने ज़ोर से हँसते हुए जोड़ा, “ब्लैक बोर्ड वाली ड्राइंग … याद है।? वो हमनें ही बनाई थी। ”वह खुद ही हँस पड़ा—ज़ोर से।हँसी कमरे में फैल गई। करन ने पास पड़ी सिगरेट मंजीत की तरफ बढ़ा दी।मंजीत ने एक लंबा कश लिया और स्मोक छत की तरफ छोड़ा। वंश ने उसी पल आँखों से इशारा किया—बस कर।कोई आवाज़ नहीं, पर मैसेज साफ़ था। मंजीत समझ गया।उसने सिगरेट नीचे कर ली और हँसी को दबा लिया। सार्थक अब तक सब सुन रहा था।उसके चेहरे पर एक्साइटमेंट थी—और थोड़ा सा नशा भी।वह अचानक बोल पड़ा ,“तुम लोग मुझे कॉलेज घुमाओगे ?
”समीर ने हल्की हँसी के साथ उसकी तरफ देखा।“ अभी?
”करन ने तुरंत बात काट दी, नहीं“ अभी नहीं...अभी ज्यादा विजिबल हो जाओगे। पकड़े जाने का खतरा है।
सार्थक ने सिर हिलाया, मानो बात समझ में आ गई हो।
फिर एक पल रुककर बोला,
“तो… मुझे भी सिगरेट दो.”
समीर ने कोई रिएक्शन नहीं दी।
बस अपनी जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला और सामने बढ़ा दिया।
सार्थक ने सिगरेट ली।
जलाते वक्त हाथ थोड़ा काँपा, पर वो छुपा गया।
आरव ने वंश की तरफ देखा और आँखों ही आँखों में मुस्कुराया—
चढ़ गई इसको.
वंश ने कुछ नहीं कहा।
बस ऑब्जर्व कर रहा था।
मंजीत ने टेबल पर नज़र डाली।
“यार …बीयर तो ऑलमोस्ट खत्म हु गई ।
रूम में एक शॉर्ट साइलेंस।
तभी सार्थक ने हल्की सी मुस्कान के साथ जेब में हाथ डाला।
और अगली ही पल, उसने तीन हज़ार रुपये टेबल पर रख दिए।
मैं और मंगवा देता हु। रुको"
कमरे में सबकी नज़र एक साथ पैसों पर गई।
यह सिर्फ जेनेरोसिटी नहीं थी—
ये सिग्नल था।
करन ने वंश की तरफ देखा। फिर मंजीत की तरफ
वंश ने कुछ सेकंड सोचा।
फिर शांत आवाज़ में बोला,
करन, मंजीत.. जाकर ले आओ
बस. डिसीजन हो चुका था।
करन उठ खड़ा हुआ।
मंजीत ने टीशर्ट पहनी।
दोनों बिना किसी एक्साइटमेंट के बाहर निकल गए—जैसे ये सब नॉर्मल हो।
दरवाज़ा बंद हुआ।
रूम में अब वंश, आरव, समीर और सार्थक रह गए।
सार्थक सिगरेट का छोटा सा कश लेकर खिड़की की तरफ देख रहा था।
उसके चेहरे पर नर्वस एक्साइटमेंट थी—
और कहीं न कहीं सेटिस्फेक्शन भी।
कुछ देर वेट करने के बाद
दरवाज़ा धीरे से खुला।
करन और मंजीत अंदर दाख़िल हुए।
हाथों में प्लास्टिक की थैली थी—उसमें बीयर की बॉटल्स खनक रही थीं और साथ में कुछ खाने का सामान भी था।
कमरे में आते ही बीयर की ठंडी बूंदों की आहट और बाहर की रात की हवा साथ घुस आई।
ने थैली मेज़ पर रखते हुए कनन किया।
लो भाई...स्टॉक रिलीफ"
समीर ने तुरंत बोतल उठा ली।
आरव ने लाइटर चलाया।
टक
Crrrk
कुछ ही देर में कमरे का हाल बदल गया।
बीयर एक के बाद एक खुलती रही।
सिगरेट की आग बार-बार जली, बुझी, फिर जली।
धुआँ इतना भर गया कि ट्यूब लाइट की रोशनी भी धुंधली लगने लगी।
हँसी अब लाउड थी।
बातें बेतरतीब।
सोचें हल्की।
पूरी रात धीरे-धीरे उस कमरे में सिमट आई थी।
सार्थक दीवार से टिक कर बैठा था।
आँखें थोड़ी लाल, पर चेहरे पर क्यूरियोसिटी जिंदा थी।
उसने सिगरेट का लंबा कश लिया और बोला—
तुम लोग...रात मै क्या क्या मस्ती करते हो?"
मंजीत तुरंत बोल पड़ा, आवाज़ लड़खड़ाती हुई,
सब कुछ" और क्या"
फिर ठहाका लगाया।
पर एक बात बता" सब कुछ कर पाएगा या नहीं?
सार्थक ने बिना सोचे जोर से सिर हिला दिया।
कर लूंगा ”
अब कोई पूरी तरह होश में नहीं था।
नशा सबकी बोलचाल से छलक रहा था।
आरव अचानक सीधा हुआ, जैसे कोई सीक्रेट याद आ गया हो।
वैसे....कॉलेज मै सीक्रेट रूम है।
समीर ने आँखें सिकोड़ कर उसकी तरफ देखा।
“कौनसा?”
“लाइब्रेरी के पास,” आरव बोला, आवाज़ में एक्साइटमेंट थी।
सुना है बहुत पुराना है। ज्यादा लोगों को भी पता।
कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।
वंश अब तक चुप था।
उसने बीयर की बोतल नीचे रखी और कुछ सेकंड सोचता रहा।
नशा ज्यादा हो गया है।" मस्ती के चक्कर में गड़बड़ हो गई तो।
उसने समीर की तरफ देखा।
फिर करन की ओर।
दोनों की आँखों में वही चमक थी—
चलो।
करन ने सिगरेट बुझाई।
बस थोड़ा बाहर घूम आते है। फ्रेश हूँ जाएगा दिमाग।
आरव और समीर ने लगभग एक साथ सिर हिलाया।
आरव ने सिगरेट का आख़िरी कश लिया और समीर की तरफ पास कर दी। सार्थक सब देख रहा था।
दिल तेज़ धड़क रहा था—एक्साइट, नर्वस, क्यूरियस… सब एक साथ।
वंश ने फाइनली बोल दिया, आवाज़ थोड़ी फर्म थी—
जाएंगे पर ज्यादा लेट नहीं"
वह जानता था—
बीयर की स्मेल l, लाल आँखें, लड़खड़ाते कदम…
अगर पकड़े गए तो सिर्फ वार्निंग नहीं मिलेगी।
“ पंद्रह बीस मिनट” उसने दोहराया।
“बस देख कर वापस.”
सबने बिना सवाल किए हामी भर दी।
दरवाज़ा खोला गया।
भाग 5 नाइट डिस्कवरी
गलियारे में पीली रोशनी थी, लेकिन रात गहरी हो चुकी थी।
कदम हल्के, आवाज़ें दबाकर—
सभी लोग कमरे से बाहर निकले।
सब लोग एक-एक करके हॉस्टल से बाहर निकले।
कोई तेज़ कदम नहीं, कोई ऊँची आवाज़ नहीं—बस नशे में भी बची हुई समझदारी।
हवा ठंडी थी।
रात गहरी।
मंजीत ने सार्थक का हाथ हल्के से पकड़ लिया—
अरे सम्भल के....इधर पत्थर है।
सार्थक हल्का-सा हँसा, लेकिन आँखें चमक रही थीं।
ये उसके लिए सिर्फ मस्ती नहीं थी—ये पहली फोरबिडेन एडवेंचर थी।
गेट के पास गार्ड की कुर्सी दिखी।
वंश ने हाथ उठा कर इशारा किया—रुकने का।
सब दीवार से चिपक कर खड़े हो गए।
किसी ने खाँसा नहीं।
किसी ने साँस तक तेज़ नहीं ली।
गार्ड का ध्यान मोबाइल पर था।
आरव ने बहुत हल्की आवाज़ में कहा—
“अब.”
और सब फिसलते हुए कॉलेज के अंदर घुस गए।
कैंपस रात में बिल्कुल अलग लग रहा था।
दिन की रौनक गायब थी।
पेड़ों की परछाइयाँ ज़मीन पर अजीब आकृतियाँ बना रही थीं।
मंजीत ने सार्थक की तरफ झुक कर पूछा—
"वैसे..वो रूम है कहां ?
समीर बिना पीछे देखे बोला—
" लाइब्रेरी के पास...बस ज्यादा पास मत जाना..पहले देख लेना।
सब लाइब्रेरी की तरफ बढ़ने लगे।
जैसे-जैसे वो पास पहुँचे, माहौल बदलने लगा।
लाइब्रेरी की दीवारें बहुत पुरानी थीं—
ऊँची, मोटी, और समय की मार से काली पड़ चुकी।
ऐसा लग रहा था जैसे वो दीवारें कुछ कह रही हों…
या कुछ छिपा रही हों।
कदम अपने-आप हल्के हो गए।
कोई नहीं हँस रहा था अब।
नशा था, लेकिन एक्साइटमेंट के साथ हल्का डर भी।
सार्थक ने फुसफुसा कर कहा—
"यार..क्या मस्त लाइब्रेरी है."
समीर रुक गया।
उसने पीछे मुड़कर सबको देखा, फिर धीमी आवाज़ में बोला—
" इस लाइब्रेरी को “ 1967 में इंडिया गवर्नमेंट ने बनवाया था।
युद्ध के बाद..यहां रिसर्च होती थी।
सबके चेहरे अटेंटिव हो गए।
फिर कुछ साल बाद अचानक बंद कर दी गई। समीर आगे बोला,
ऑफिशल रीजन कभी क्लियर नहीं हुआ...बाद मैं ये जगह नादवात यूनिवर्सिटी को दे दी।
सार्थक की क्यूरियोसिटी बढ़ गई।
“कौनसी रिसर्च?”
एक पल के लिए समीर चुप रहा।
उसी पल मंजीत बीच में घुसा—
" आत्माओं पर .”
बस।
सार्थक अचानक बिल्कुल शांत हो गया।
दो सेकंड की ख़ामोशी।
फिर आरव ने होंठ दबाकर हँसी दबाई।
करन ने सिर झुकाकर हल्का ठहाका लगाया।
वंश ने बस आँख घुमाई।
मंजीत ने सार्थक की तरफ देखा।
“मजाक था बे…या शायद नहीं"
अब हँसी दबे-दबे आवाज़ में निकली।
ऐसी हँसी, जो डर और मस्ती के बीच की होती है।
सार्थक ने सूखा-सा निगल लिया।
" तू हर बार ऐसा ही करता है क्या ?"
मंजीत ने कंधा उचकाया।
“रात मै तो हा "
लाइब्रेरी उनके सामने थी—
भारी दरवाज़ा, जंग लगा हैंडल और एक अजीब सी ठंडक।
वंश ने आगे बढ़कर फुसफुसाया—
बस...अब केयरफुल यही कही होना चाहिए वो कमरा"
रात और गहरी हो गई थी।
सब लोग लाइब्रेरी के सामने आकर रुक गए।
रात की हल्की रोशनी में इमारत और भी पुरानी लग रही थी। मोटी दीवारें, ऊँची छत और टूटी हुई खिड़कियाँ—जैसे वक़्त यहाँ आकर ठहर गया हो।
सब बिना बोले एक-दूसरे को देखने लगे।
नशा अब भी सिर में था, लेकिन माहौल ने उसे थोड़ा दबा दिया था।
लाइब्रेरी के एक कोने में दीवार थोड़ी उखड़ी हुई थी।
वहीं पास में एक छोटा-सा कमरा दिख रहा था—अधूरा, अँधेरा और रहस्यमय।
मंजीत ने फुसफुसाकर पूछा,
“अरे… वो कमरा यही है क्या?”
सब इधर-उधर रास्ता ढूँढने लगे।
तभी समीर ने एक पुराने लकड़ी के शेल्फ को खिसकाया।
“इधर से आओ,” उसने धीमी आवाज़ में कहा।
पीछे एक सँकरा रास्ता खुला।
एक-एक करके सब अंदर चले गए।
अंदर जाते ही हवा भारी लगने लगी।
कमरे में पुरानी किताबें इधर-उधर पड़ी थीं, उन पर जमी धूल साफ़ बता रही थी कि यहाँ कोई बरसों से नहीं आया।
आरव ने झुककर एक किताब उठाई और हाथ से धूल झाड़ी।
कवर पर साल लिखा था—1947 से पहले की।
“यार… ये तो बहुत पुरानी है,” उसने कहा।
फिर चारों तरफ़ देखकर बोलता चला गया,
“सुना है, जब इंडिया–पाकिस्तान और चीन के युद्ध हुए थे, तब ये यूनिवर्सिटी शुरू हुई थी। पहले यहाँ सरकारी रिसर्च होती थी।”
सब उसकी बातें ध्यान से सुन रहे थे।
कहते हैं,” आरव ने आवाज़ और धीमी कर ली,
“दुश्मन सैनिकों को यहाँ लाकर उन पर रिसर्च की जाती थी।”
सार्थक का गला सूख गया।
उसने हिचकिचाते हुए पूछा,
“कैसी रिसर्च ?”
आरव ने हल्का-सा कंधा उचकाया।
“पता नहीं… बस ये सुना है कि रात में लोगों की चीख़ों की आवाज़ आती थी।”
कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।
आरव ने नीचे ज़मीन पर पैर रखा और बोला,
“यही वो जगह थी…टॉर्चर चैंबर"
और हम अभी… यहीं खड़े हैं।”
सार्थक जैसे पत्थर का हो गया।
जिस जगह खड़ा था, वहीं जड़ हो गया।
फिर अचानक—
मंजीत की दबी हुई हँसी गूँजी।
समीर ने मुँह फेर लिया।
करन के कंधे हिलने लगे।
धीरे-धीरे सब हँस पड़े।
सार्थक ने राहत की साँस ली और बोला,
“अरे यार… सच में डरा ही दिया।”
वो भी हँस दिया, मगर उसकी हँसी में हल्की घबराहट अब भी थी।
वंश ने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई—
कमरा, किताबें, अंधेरा।
फिर शांत लेकिन सख़्त लहजे में बोला,
“चलो… ज़्यादा देर यहाँ नहीं रुकते।”
बाक़ी सब उसकी बात मानकर बाहर की ओर बढ़ने लगे।
लेकिन सार्थक एक पल रुक गया।
उसने पीछे मुड़कर उस कमरे को देखा।
उसे नहीं पता था कि ये सब सिर्फ़ मज़ाक था…
या इस रात ने उसके अंदर किसी डर को सच में जगा दिया था।
सब लोग बाहर की तरफ़ बढ़ने ही वाले थे कि तभी सार्थक की नज़र ज़मीन पर पड़ी एक किताब पर टिक गई।
वो धीरे से झुका और किताब उठा ली।
कवर पुराना था, किनारे घिसे हुए।
ऊपर हल्के से लिखा था—
“Play this song… someone will listen you.”
सार्थक ने हल्की-सी भौंहें चढ़ाईं।
उसके लिए ये सब बिल्कुल नया था।
वो पहली बार यहाँ आया था।
पहली बार इस तरह की जगह, इस तरह के लोगों के साथ।
हर चीज़ उसके लिए डिस्कवरी थी।
उसने किताब खोली।
अंदर शब्द नहीं थे—
सिर्फ़ पियानो नोट्स ।
पुराने, हाथ से लिखे हुए, कुछ जगह मिटे हुए।
वो समझ नहीं पाया कि ये किस तरह का म्यूजिक है, या इसका मतलब क्या है।
बस इतना लगा कि ये किताब आम नहीं है।
पीछे आरव और मंजीत कुछ दिखा रहे थे—
“इधर देख… यहाँ क्रैक्स हैं”
“ये शेल्फ कितनी पुरानी है…”
सबकी बातें चल रही थीं, लेकिन सार्थक थोड़ी देर के लिए उनसे अलग हो गया था।
उसने इधर-उधर देखा।
कोई उसकी तरफ़ ध्यान नहीं दे रहा था।
एक पल की हैसिटेशन।
फिर एक अजीब-सी एक्साइटमेंट।
“शायद कभी बाद में देखूंगा ” उसने मन ही मन सोचा।
उसने किताब को मोड़ा और चुपचाप अपनी पैंट के अंदर फँसा लिया।
दिल थोड़ा तेज़ धड़कने लगा—डर और थ्रिल दोनों से।
तभी वंश की आवाज़ गूँजी,
"बस...काफी हो गया"
रात बहुत हूं रही है निकलते है।
सबने एक-दूसरे की तरफ देखा और बिना बहस किए सिर हिला दिया।
वो उसी रास्ते से बाहर निकले।
बिना शोर किए, बिना पीछे देखे।
थोड़ी देर में सब वापस होस्टलके कमरे में थे।
धुआँ, खाली बॉटल्स और बिखरी कुर्सियाँ—सब वैसा ही पड़ा था।
सार्थक अब पहले जैसा नहीं था।
वो अब उनके बीच खुद को शामिल महसूस कर रहा था।
उनकी हँसी, हल्की-सी चालाकी, नशे में उखड़ी बातचीत—सब उसके लिए अब अपना माहौल बन चुका था।
लेकिन उसके हाथ में एक राज़ भी था—वो किताब, जिसे उसने लाइब्रेरी से चुपके से अपनी जेब में रख लिया था।
किसी ने कुछ नहीं देखा, किसी को कुछ पता नहीं था।
वो किताब उसके लिए नया रहस्य थी, उसकी पहली डिस्कवरी।
और इसी सोच में वो हल्की मुस्कान के साथ अपनी बेंच पर बैठ गया।
उसने Vansh की तरफ़ देखा।
“आज सच में मज़ा आया… बहुत enjoy किया।
मैं… मैं चलता हूँ।”
वंश ने सिर बस हल्के से हिलाया।
नशे में ढीले, पर समझदार, उसकी नज़र में एक तरह की सहमति थी।
Sarthak को लगा जैसे वो वाकई वंश से जाने की अनुमति मांग रहा हो।
बाकी लड़के धीरे-धीरे सोने लगे।
समीर कुर्सी पर झुक गया, मंजीत बिस्तर पर, और करण-वंश के कमरे के एक कोने में गहरी नींद में खो गए।
कभी-कभी सिगरेट की अधूरी धुंध हवा में उठती और फिर गायब हो जाती।
To be continued...